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न खुदा मिला न विशाल..

 

श्रीगोपाल गुप्ता

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पतन के साथ ही भारतीय जनता पार्टी का देश के पन्द्रह राज्यों में फैला साम्राज्य अब केवल 12 राज्यों में सिमट गया। इसके साथ ही नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक सन् 2013 से तेजी से विस्तार हो रहे देश के राज्यो के जीतने का सिलसिला भी अब थम सा गया है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरी भारतीय जनता पार्टी की इसी साल मार्च में उसकी और उसके सहयोगी दलों का देश के अधिकांश राज्यों में कब्जा हो गया था। इसकी कुल संख्या 20 हो गई थी जहां भगवा झंडा बुलंदी से लहरा रहा था, इसमें एक और बृद्धी मई माह में जब हुई तब कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरी और राज्यपाल ने उसके नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी। ये आजाद भारत में अभी तक सबसे बड़ा फीगर था, जब किसी राजनीतिक दल ने देश के इतने भू-भाग पर कब्जा कर लिया था। लगभग 133 वर्ष पुरानी कांग्रेस भी अपनी बुलंदियों दिनों में रहते हुये यह करिस्मा कर पाने में नाकाम रही थी। एक बारगी तो देश और विदेश को लगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा प्रमुख अमित शाह के सपनों के अनुसार ही भारत कांग्रेस मुक्त होने की राह लगभग पार ही कर गया।मगर यह खुशी भाजपा के खेमे में ज्यादा समय तक नहीं रह पाई। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में दो नंबर की हैसियत में आई कांग्रेस ने गोवा और मणिपुर में बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता गंवा देने से सबक लेते हुये मात्र 37 सीट लेकर किंगमेकर की भूमिका में आई जनता दल सेक्यूलर के नेता एचडी कुमारस्वामी को ही किंग बनाते हुए मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा की खुशियों की वाट लगा दी। नतिजन मात्र 9 दिन के ही अपने अल्पकालीन कार्यकाल को बिराम देते हुये येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके थोड़े दिन बाद जून में ही आपसी विरोधाभास के कारण जम्मू-काश्मीर की सहयोगी पीडीपी सरकार का भी पतन हो गया और राज्यों के जीतने और विस्तार में कमी आ गई। लिहाजा पार्टी की खुद की सरकार 15 राज्यों और सहयोगियों के साथ 19 राज्यों में रह गई।

माना जा रहा है कि सन् 2013 के बाद पार्टी को जोर का झटका धीरे से तब लगा जब उसने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति प्रेम के कारण अपने सबसे महत्वपूर्ण और पन्द्रह बर्षों से शासित राज्य मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ सीधी लड़ाई में कांग्रेस के हाथों गंवा दिये, इसके साथ ही भाजपा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का दमदार और करिस्माई नेतृत्व होने के बावजूद पांच वर्ष पूर्व जीते राज्य राजस्थान को भी कांग्रेस के हाथों नहीं बचा पाई। हालांकि भाजपा ने अपनी इस बड़ी इस हार पर चिंतन-मंथन कर समीक्षा करने की बात कही थी, मगर उसके नेताओं की कार्यशैली से लगता नहीं है कि वे इस हार की समिक्षा करेंगे? ऐसा लगता है कि हार के प्रति वे चुनाव के पूर्व से ही आश्वसत थे। शायद यही कारण है कि पार्टी के दिग्गज नेता और मप्र में हारे कई मंत्री इस हार का ठीकरा केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा इसी वर्ष न्यायालय के आदेश के विरूद्ध मॉनसून सत्र में लाये गये एससी/एसटी एक्ट पर फोड़ रहे हैं। हालांकि अन्य कारण भी हो सकते हैं मगर राजनीतिक पण्डितों और पार्टी के कद्दावर नेताओं के अनुसार मुख्य भूमिका इसी एक्ट रही। सन् 1989 में भाजपा के सहयोग से केन्द्र में जनता दल पार्टी के प्रधानमंत्री बने विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सन् 1979 में स्थापित विन्देश्वरी प्रसाद मंडल कमिशन की रिपोर्ट पर सामाजिक एवं आर्थिक रुप से पिछड़ों को देश में सम्मान दिलाने सरकारी नौकरी में 27.5 प्रतिशत आरक्षण व एससी/एक्ट लागू किया था। इस एक्ट में कुछ विसंगतियों को देखते हुए न्यायालय ने गत 20 मार्च को कुछ संसोधन किये थे जिस पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति ने 2 अप्रैल को बड़ा आंदोलन किया। इसके मद- ऐ -नजर और दलित प्रेम के कारण नरेन्द्र मोदी ने एक्ट को और कड़ा करके पास करवा लिया, इससे उच्च वर्ग के परंपरागत पार्टी के मतदाता पार्टी से नाराज हो गये। इस आग में घी डालने का काम मध्य प्रदेश के निर्वतमान मुख्यमंत्री शिवराज ने यह कहते हुये कर दिया कि आरक्षण को कोई माई का लाल हमारे रहते खत्म नहीं कर सकता। इन तीन राज्यों के चुनाव परिणाम ने यह साबित कर दिया कि दलित भाजपा के साथ नहीं आये बल्कि इस दफा उन्होने बसपा को भी नकारते हुये भाजपा की घुर विरोधी कांग्रेस का थामन थाम लिया जबकि सर्वणों की नाराजगी अलग से मिल गई अतः कहा जा सकता है कि अत्याधिक महत्वाकांक्षा के कारण “न खुदा मिला न विशाल-ऐ-सनम”।

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