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जौरा में बाहरी प्रत्याशी बर्दाश्त नहीं

जौरा में बाहरी प्रत्याशी बर्दाश्त नहीं

आनंद त्रिवेदी. यूनिक टुडे जौरा
जौरा जो कभी मुरैना जिले का भी जिला मुख्यालय था। उसके बाद मुरैना मुख्यालय बना, अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण जौरा का नाम इसलिए इतिहास में दर्ज है कि जब मध्य भारत बना और उसके बाद मध्य प्रदेश यह कांग्रेस का प्रारंभ से ही रियासत के जमाने से ही कांग्रेस का गढ़ रहा। उसके बाद यहां से या तो कांग्रेस जीती या फिर समाजवादी, प्रजा समाजवादी जैसे प्रारंभ से लेकर रामचरण लाल मिश्र के विधायक रहने तक उनको चुनौती देने वाले थे छोटे लाल भारद्वाज जो पहाड़गढ़ से थे उसके बाद राजा पंचम सिंह जो प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के थे पहाड़गढ़ के थे और उसके बाद कांग्रेस को जिसने चुनौती दी वह बहुत बड़ा नाम है सूबेदार सिंह समाजवादी थे लेकिन जनता दल आपातकाल के बाद जो स्थितियां बनी उसके बाद सूबेदार सिंह सिकरवार एडवोकेट ने जौरा का दो बार नेतृत्व किया लेकिन कांग्रेस ने जौरा में बाहरी प्रत्याशियों को उतारकर इस सोच के साथ कि वहां जिसे हम खड़ा करेंगे वह जीत ही जाएगा, बहुत बड़ी गलती की और यहीं से जौरा में कांग्रेस का प्रभाव शुरू हुआ। कांग्रेस ने ही नहीं अन्य दलों ने भी बाहर के प्रत्याशी उतारे और वे हमेशा पराजय का ही सामना कर सके! जैसे जौरा में रामचरण लाल मिश्र। विजयाराजे सिंधिया जिनको राजमाता कहा जाता था उनको लेकर जब ग्वालियर-चंबल संभाग में सभी विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव हुए तो जौरा को छोड़कर शेष सभी सीटों पर राजमाता सिंधिया के ही प्रत्याशी विजय हुए थे। यह है वह जौरा जहां पर बाहरी प्रत्याशियों को कभी स्वीकार नहीं किया गया जैसे रामनिवास शर्मा जो उस समय मध्यप्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष हुआ करते थे यशवंत सिंह कुशवाहा मुरार-ग्वालियर के निवासी हैं और बाहरी तौर के कारण ही उनकी करारी हार हुई लेकिन इस बार जौरा क्षेत्र से पंकज उपाध्याय को टिकट दिया गया है जौरा में ऐसी हवा है कि यह बाहरी प्रत्याशी हैं मैं यह कहना चाहता हूं कि बाहरी प्रत्याशियों का जो इतिहास अभी तक जौरा विधानसभा क्षेत्र में रहा है वह कांग्रेस के लिए बहुत कामयाब नहीं रहा है एक बात मैं फिर भी कहना चाहूंगा जौरा में राजमाता सिंधिया के प्रभाव के बावजूद आजादी से लेकर 2014 के चुनाव तक कांग्रेस जीती, समाजवादी जीते, जनता दल के लोग जीते, बसपा जीती थी, लेकिन भाजपा नहीं जीती थी, परंतु 2014 में जौरा की इस विशेषता को भाजपा ने समाप्त कर दिया। उसके बाद के अगले चुनाव में फिर कांग्रेस जौरा से जीती जैसा मैंने पहले कहा जौरा के अलावा जौरा तहसील के रहने वाले अथवा अधिकांश पहाड़गढ़ के रहने वाले विधायक बने। वर्तमान में पंकज उपाध्याय बाहरी प्रत्याशी हालांकि इस बात को दूर करने की बहुत बड़ी कोशिश करेंगे लेकिन जौरा का मतदाता इस मामले में बहुत समझदार हैं। यहां एक बात और भी ध्यान में रखने की है जौरा में कांग्रेस को पीछे पिछड़ जाने का कारण क्या है बस वस्तुतः कारण यह है जोरा में जब से कांग्रेस के सामने सामंतों ने कांग्रेस को बांटा वहीं से कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। जब से जौरा राजा दिग्विजय सिंह और महाराज सिंधिया के बीच वटी तब से कांग्रेस का बंटाधार हो गया। जैसे वर्तमान में बीजेपी जिसको टिकट देगी उसके साथ सिंधिया का भी जनाधार होगा यह कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी चुनौती है उसमें भी बाहरी प्रत्याशी खड़ा करके कांग्रेस ने गलती की है या सही निर्णय लिया है यह तो परिणाम ही बताएगा? लेकिन सिंधिया के बीजेपी में जाने और कांग्रेस के सामंतों की कलाई खुल जाने से जौरा की जनता क्या निर्णय लेती है यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन बाहरी प्रत्याशी जौरा में जौरा के मूल्यों को बदल पाएगा या नहीं? सिंधिया और भाजपा के गठबंधन के सामने कांग्रेस को टिकट देते समय और सावधानी बरतनी थी। सुनील शर्मा, भानु प्रताप सिंह सिकरवार (चिंटू), मानवेंद्र सिंह सिकरवार (गांधी) जैसे कर्मठ और समर्पित कार्यकर्ताओं को जो सामंतों की राजनीति से परे रहकर जौरा की सेवा करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे थे उन्हें आगे बढ़ाने की जरूरत थी अथवा नहीं इसका उत्तर तो चुनाव परिणाम ही देंगे। को बांटा

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