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न्यायाधीष कर्त्तव्य का निर्वाह न करें तो पीड़ित के अधिकारों का हनन-एम.एन. भण्डारी

 

जयपुर ”हम अधिकारों की बात करते हैं लेकिन कर्त्तव्यों की नहीं, यदि न्यायाधीश अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह न करें तो किसी पीड़ित के अधिकारों का हनन होगा।“ ये शब्द राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. एन. भण्डारी ने कहे। वे आज एसोसिएश फोर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) द्वारा चेम्बर भवन में ”भारत में मानवाधिकार की स्थिति और हमारी न्यायपालिका“ विषय पर अयोजित सिम्पोज़ियम में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में क़ानून के विद्यार्थी भी थे। उन्होंने कहा कि सरकार और पुलिस अपने कत्तव्यों का निर्वाह नहीं करते इसलिए लोगों के अधिकारों का हनन होता है लेकिन इसके लिए कहीं न कहीं हम भी ज़िम्मेदार हैं। हम ऐसे लोगों को चुन कर भेजते हैं जो शासन चलाने के योग्य ही नहीं होते। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कई अन्डर ट्रायल्स इसलिए बरसों तक जेल में पड़े रहते हैं यहाँ तक कि उन पर लगाए गए आरोप के वास्तविक दंड की अवधि से भी अधिक समय हो जाता है क्योंकि न्यायालयों पर काम का अत्यधिक बोझ है और जजों की संख्या कम है साथ ही प्रोसीक्यूशन की ओर से भी देर होती है।
विशिष्ट अतिथि के रूप में सम्बोधित करते हुए उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पानाचंद जैन ने कहा कि मनुष्य को प्राकृतिक रूप से जन्म से ही अधिकार प्राप्त हैं जो उसे मिलने ही चाहिएं। उन्होंने कहा कि देश के हर बच्चे को कम से कम 10 वर्षों तक अनिवार्य रूप से निःशुल्क शिक्षा मिलना चाहिए और इसे मूल अधिकारों में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में हर स्तर पर मानवाधिकार का हनन हो रहा है परन्तु किसी सरकार ने लोगों के अधिकारों की रक्षा नहीं की। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की गारंटी देता है। उन्होंने कहा कि न्यायालय क़ानून की सीमा में बन्धे होते है अतः कई बार पीड़ित को वांछित न्याय नहीं मिलता।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग के सेवानिवृत्त अध्यक्ष प्रोफेसर राजीव गुप्ता ने कहा कि सरकारों द्वारा बनाए गए विकास के किसी भी मॉडल में आमजन की किसी भी आवश्यकता की पूर्ति नहीं है, सड़कों पर भीख मांगते बच्चे हमारे विकास की तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने पुलिस द्वारा फेक एन्काउन्टर की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें लोगों को मारने में कोई हिचक नहीं होती क्यों कि ये मरने वाले उनके तथाकथित विकास के रास्ते में रुकावट हैं। उन्होंने कहा कि हमारे देश के एटार्नी जनरल इसे मान्यता नहीं देते परन्तु वास्तविकता यह है कि संवैधानिक नैतिकता के बिना देश नहीं चल सकता। उन्होंने कहा कि कई संवैधानिक संस्थाओं को इसलिए समाप्त किया गया कि वे सत्तासीन लोगों के निहित स्वार्थों की पूर्ति में रुकावट थीं। उन्होंने कहा कि आज हर स्तर पर संवैधानिक संस्थाओं के कार्य को शासन द्वारा प्रभावित किया जा रहा है।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए एपीसीआर के राष्ट्रीय सह-सचिव रफ़ीक़ अहमद ने कहा कि केवल शक के आधार पर लोगों को असीमित समय तक जेलों में रखा जाता है, उनके परिवार और स्वयं उन के जीवन बर्बाद हो जाते हैं यह वास्तव में न्याय का उपहास है। उन्होंने कहा कि आज संवैधानिक संस्थानों को तोड़ा जा रहा है ताकि जनता के अधिकारों का मनमाने ढंग से हनन किया जा सके। उन्होंने कहा कि अदालतों में लगने वाले समय को कम किया जाना चाहिये और न्यायिक प्रक्रियाओं में सरलता लाई जानी चाहिए तथा त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे देश में गवाहों की सुरक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं है जिससे या तो गवाह डर जाते हैं या बिक जाते हैं और पीड़ित न्याय से वंचित रह जाते हैं।
एपीसीआर के प्रदेशाध्यक्ष पैकर फ़ारूक़ एडवोकेट ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि देश में मानवाधिकारों की स्थिति चिंताजनक है। हिरासत में होने वाली मौतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस का काम रक्षा करना है लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो रक्षा कौन करेगा। प्रदेश उपाध्यक्ष सैयद सआदत अली ने अतिथियों का स्वागत किया, मंच का संचालन प्रदेश सचिव एडवोकेट कलीम अहमद ने किया तथा प्रदेश मीडिया सचिव डा. मुहम्मद इक़बाल सिद्दीक़ी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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