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क्या भाजपा में आकर सिंधिया का रसूख कम हो गया है।


रिपोर्ट : यूनिक टुडे न्यूज़

 महाराज और श्रीमंत जैसे संबोधन अब ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम के आगे उनके सिर्फ कुछेक समर्थक ही लगाते हैँ। उनके आदमकद पोस्टर और उनके स्वागत के लिए बड़े बड़े बैनर पोस्टरों का साइज भी कम हो गया है। जिस महल की राजनीति पर कभी भी कोई उंगली उठाने की हिम्मत नहीं करता था, आज उस महल की राजनीति को पानी पी पीकर कोसा जा रहा है। ऐसा लगने लगा है, जैसे मानों भाजपा में आकर सिंधिया ने व्यक्तिगत तौर पर काफी कुछ खो दिया है।
 देश की सियासत के सबसे अहम घरानों में से एक सिंधिया परिवार के इकलौते वशंज ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब भाजपा की सदस्यता ली थी, तब भाजपा के दिग्गजों द्वारा यह भरोसा दिलाया गया, कि भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजमाता जैसा सम्मान देगी। भाजपा द्वारा इस तरह की कवायद स्वभाविक भी थी, क्योंकि सिंधिया अपने साथ सिर्फ कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ताओं की फौज ही लेकर नहीं आए थे, बल्कि उन्होंने मध्यप्रदेश की सत्ता भी भाजपा की झोली में डाल दी थी। लिहाजा सिंधिया के लिए विशेष सम्मान के साथ खास ओहदा मिलना स्वभाविक था। लेकिन मानो, इस पूरे सियासी घटनाक्रम के दौरान सिंधिया अनचाहे तौर पर ही ठगे रह गए, और जिस अपेक्षा के साथ वह भाजपा में गए थे, वह तो पूरी नहीं हुई, बल्कि उनसे जुड़ा वो रसूख भी छिन गया, जो कल तक उनकी पहचान हुआ करता था।  
केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बयान पर गौर कीजिए, सिंधिया के खिलाफ पोस्टरबाजी के सवाल के जवाब में उन्होंने एक ऐसी बात कही, जिसे कहीं न कहीं सिंधिया के सियासी कद पर निशाने के तौर पर समझा जा सकता है। तोमर का कहना था, कि सिंधिया कोई जनप्रतिनिधि ही नहीं है, जो जनता के बीच जाएं। यहां गौर करने वाली बात यह है, कि गुना से चुनाव हारने का अहसास कभी भी किसी कांग्रेस ने सिंधिया को नहीं करवाया, जबकि भाजपा में आने के बाद उसके कद्दावर नेता ही ऐसा करने लगे हैं। जाहिर है, कि शायद अब सिंधिया के पास वो रसूख नहीं रहा, जिसके कारण उन पर बोलने से पहले कोई कुछ सोचे। गौरतलब है, कि एक समय बतौर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा महल की मुखालिफत करके अपनी ही पार्टी में घिर चुके हैं। तब के हिसाब से सिंधिया का सियासी रसूख 10 फीसदी भी नजर नहीं आता। 
अब दूसरे पहलुओं पर गौर करें, कल तक जो सिंधिया कांग्रेस में रहकर बात बात पर कमलनाथ सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की धमकी देते थे, पूर्व सीएम कमलनाथ के साथ ऐसे पत्र व्यवहार करते थे, जैसे विपक्ष के नेता हो। लेकिन भाजपा में आने के साथ ही सिंधिया के भीतर का यह बागीपन मानों कहीं गायब हो गया है, कभी कभार ट्वीट के माध्यम से उनका कोई संदेश आता है, उसमें भी सरकार की वंदना ही समाहित होती है। यहां गौर करने वाली बात यह है, कि जन अतिथि शिक्षकों के लिए सिंधिया ने नाथ सरकार को मैदान में उतरने की धमकी दी थी, आज शिवराज सरकार के दो महीने पूरे होने के बाद तक उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस विषय में कोई सलाह तक नहीं दी। पता नहीं, सिंधिया का मन बदल गया है, या भाजपा सरकार के सामने वह अपनी बात रखने से हिचक रहे हैं। 
 मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा उपचुनाव की दहलीज पर खड़े हुए हैं, इन उपचुनाव में दोनों ही दलों से सिंधिया दांव पर लगे हुए हैं। जाहिर है, यही चुनाव उनका सियासी भविष्य तय करेंगे अगर भाजपा इनमें बेहतरीन प्रदर्शन करती है, तो सिंधिया का कद और पद दोनों बढ़ सकता है, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इसका उन्हें घाटा होना भी तय है। लिहाजा यह वक्त सिंधिया की लिए काफी चुनौतीपूर्ण है, जिसका असर उनके सियासी क्रियाक्लापों पर नजर आ रहा है। जो काफी संकुचित भी है और सधे हुए भी, इसके साथ ही सिंधिया की यही शैली उनकी पुरानी राजनीतिक शान को भी बौना करने का काम कर रही है।

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