Breaking News
Home / Uncategorized / “2 अखबारों का प्रधान-संपादक हूँ, आपकी ‘पब्लिक सिटी’ छपी है, 12 हजार का बिल है,,,

“2 अखबारों का प्रधान-संपादक हूँ, आपकी ‘पब्लिक सिटी’ छपी है, 12 हजार का बिल है,,,

डा. रामकुमार सिंह 
मुरैना।( बज्जिर-टुडे) हमने समझा कि जो संदिग्ध-हिस्ट्रीशीटर जैसी ‘सकल’ का आदमी, अधिकारी से बात कर रहा है वो दो-दो अख़बार चलाता होगा! बाद में उसने खुलासा किया ‘‘अख़बार तो एक ही है उसे दो प्रतियों में छाप लाया हूँ। एक प्रति हमारी फाइल में रहेगी दूसरे से आपकी ‘पब्लिक सिटी’ हो गई है।’’ पीआरओ ने कहा, ‘‘एक प्रति और चाहिए बिल के साथ भी तो लगेगी।’’ तो प्रधान सम्पादक बोला, ‘‘ए-4 साइज के खाली काग़ज दे-दो। तीसरी प्रति उस पर हाथ से उतार देता हूँ।’’
ऐसे हस्तलिखित अख़बार के प्रधान सम्पादक को देखकर मेरा मस्तक श्रद्धा से झुक गया। मुझे भारतेन्दु-युग की याद आ गई ।
डॉ. सुरेश सम्राट ने पूछा कि ‘‘तुम ऐसे रेडलाइट ऑफिस में गए ही क्यों, जहाँ ऐसा ‘‘पब्लिक सिटी दुष्कर्म’’ रोज चलता हो। दरअसल मोबाइल पर एक फ्रॉड का कॉल आया था जिसने कहा कि अपने जीवित होने का प्रमाण दो। मैंने उसे फोन पर काफी समझाया कि ‘‘मैं बोल रहा हूँ इससे सिद्ध होता है कि जीवित हूँ।’’ उसने कहा ’’बेवकूफ आदमी तेरा खाता बंद हो जाएगा फिर क्या खाएगा ?’’
इसी चक्कर में ऑफिस गया था। ऑफिस के बाबू ने कहा कि आपके जीवित होने का प्रमाण तो हम नहीं दे सकते, अलबत्ता ‘जनम-प्रमाण पत्र’ दे देंगे उससे एवरेज निकालकर जिसको जरूरत हो, आपको जीवित मान ले! इसी प्रसन्नता में पीआरओ कक्ष में बैठे थे कि उक्त घटना हो गई।
वरिष्ठ पत्रकार आदर्श गुप्ता, रविन्द्र सिंह सिकरवार, अवधेश डण्डोतिया और आनंद त्रिवेदी जी के माध्यम से पता चला कि ऐसी कई गुमनाम पब्लिक सिटी इस सिटी में हैं जो सरकार की योजनाओं का प्रचार दूर-दूर तक पहुँचा रही हैं। उनकी लिस्ट को पढ़कर हमारी तो छाती फट गई! दरअसल ये प्रधान सम्पादक काफी दूर से पैदल बिल लगाने ऑफिसों में आते होंगे, इसलिए दूर-दूर तक ‘पब्लिक सिटी’ हो जाती होगी। और क्या ?
एक आदमी तो अख़बार निकालता ही नहीं बस दाँत निकालता है और हैं! हैं! हैं! हैं! करके कहता है ‘‘जे कै रए! कै भाईसाब के साथ रैली में आए हते, सोची कै बिल लगावत चलैं। हैं! हैं! हैं! हैं! ‘अदक्षजी’ ते बात है गई है, भाईसाब की (ईईईई)। आप अपने फोन ते लगाय कैं पूछि लेओ। हमाए में बैलेंस नहीं है। हैं! हैं! हैं! हैं! बिल को पेमेंट है जागो तब बैंलेंस डराय लेंगे। हैं! हैं! हैं! हैं!’’
जिन सरकारी महकमों में जनप्रतिनिधि भी साथ विराजते हैं उस सदन के सदस्यों के गाँव-परिवार से कई गरीब-गुरबा अपने पुड़ियाखाने लड़कों को लेकर पहुँचते हैं और कहते हैं ‘‘हिला! अब तुम इतैक बड़े नेता है गए, जा मोड़ा को कछू हिल्लो लगाऊ (नहीं तो तुमें हिल्लें लगाए देंगे) तो माननीय सदस्य को एक ही बात सूझती है क्यों न इस लड़के के नाम से एक ‘पब्लिक-सिटी’ के बिल को कट्टा छपवाय लें। उसके साथ बिल लगाकर यह तत्काल सतुआ-अधिकारी (स्वत्वाधिकारी) हो जाएगा। इस तरह ‘पब्लिक-सिटियों’ की बाढ़ देखकर सीबाआई की भी ‘किल्ली’ छूट गई है। इस प्रकार के महाघोटाले हर महकमे में हैं इसलिए एक आदमी आरटीआई लगाकर सूची निकलवाता रहा तो उसके प्राण निकल जाएँगे, और अधिकारी तो अमर हैं, एक निबटेगा दूसरा आ जाएगा। रही फर्जी पत्रकारों की सो उनकी पीठ सरियन ते गोद कैं टेटू बनाय दिए जाएँ….जैसा कि हाल ही में एक संदिग्ध फोटो वायरल हुआ है। फिर जैसी पंचन की राय….. वैसे हम भी सोच रहे हैं कि बज्जिर-टुडे आर्टिकल्स के प्रिंट आउट निकाल कर बिल लगाय आएँ …..माड़साब!

About Unique Today

Check Also

मेडिकल स्टोर पर जनता की सुरक्षा के लिए कम रेट- 10 से 5 रुपए में मास्क बेच रहे है।

सरिता सोनी जयपुर – जयसिंह पुरा खोर सुपर मार्केट में देवेंद्र वरदानी अपने घर से …

One comment

  1. जगदीश शुक्ला

    बज्जर टुडे जैसा अखबार यकीनन अपेक्षित पब्लिक सिटी भी नहीं कर सकता। क्योंकि पब्लीसिटी के लिए यह आवश्यक है कि वह अखबार भले ही एक प्रति में छपा हो लेकिन उसको हजारों पाठक पढ़ते हो तभी तो पब्लिसिटी का उद्देश्य पूरा हो सकेगा। वैसे भी जानबूझकर जुलाब कौन लेना चाहेगा बज्जर टुडे के व्यंग की धार कदाचित हर किसी के समझ में भी नहीं आ सकेगी इसको पढ़ने के लिए और इसके टारगेट को समझने के लिए थोड़ा बहुत दिमाग काम नहीं कर सकता। इसलिए रामकुमार भाई आप पब्लिक सिटी के मोह से दूर ही रहे तो अच्छा है। सजाती लोगों को व्यंग की ऐसी धार के नीचे लेने की धृष्टता आप ही कर सकते हैं बेचारे जो लोग जैसे तैसे जुगाड़ लगाकर अपने घर गृहस्ती चला रहे हैं। उन वैचारों की मजबूरी समझने की भी कोशिश करना चाहिए राम कुमार जी क्योंकि कुछ तो मजबूरी रही होंगी वरना कोई यूं ही किरदार नहीं बेचता। कम से कम उन्हें सर जा सजातीय मानकर ही बख्श दिया होता। फिर भी बज्जर वाणी के इस दुस्साहस की दाग दी जानी चाहिए ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *