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पीजी कॉलेज के मूलचंद (मूला) और निगम के मूलचंद (वर्मा)!

मुरैना। बज्जिर टुडे। दो मूलचंद हैं। दोनो ‘खूंटा-पकड़’ हैं। एक थे। एक हैं। एक पीजी कॉलेज की फीस खिड़की के अंदर बैठते थे और दूसरे नगर निगम मुरैना में ‘नहीं बैठते हैं’ ।

दोनों ही बड़े ‘बज्जिर’ व्यक्तित्व हैं। ‘मूला’ दिन भर सक्रिय रहकर रात में निढाल हो जाता था और मूलचंद वर्मा दिन ढल जाने के बाद सक्रिय होते हैं। मूलचन्द का व्याकरण में अर्थ है ‘चाँद’ (खोपड़ी) पर कितना भी दबाव हो मगर ‘मूल’ को पकड़े रहे।
90 के दशक में पीजी कॉलेज की फीस जमा खिड़की पर ‘मूला खोल’, ‘मूला जमा कर’ …..ऐसी आवाजों के साथ लकड़ी के दरवाजे पर लातें पड़ती थीं। जिसके हाथ ‘मूला’ के गिरेबान तक पहुँच सकते थे वे खिड़की से ही ‘मूला’ का टेंटुआ पकड़ लेता था। मगर मज़ाल है कि ‘मूला’ की आत्मा को कोई हिला सके। सूखे-सर्रे ‘मूला’ संतों के समान मान-अपमान, भय-द्वैष से मुक्त हो गए थे। सरल भाषा में इसे ‘बेशर्म’ भी कहा जा सकता है। पीजी कॉलेज के ऑफलाइन साहित्य में 90 के दशक को ‘मूला-युग’ के नाम से जाना जाता है। उस समय फीस जमा करना एक चुनौती थी। उस आपातकाल ने जिन नेताओं को जन्म दिया उनमें गिर्राज नेताजी भी हैं जो वर्तमान में दिमनी विधानसभा से विधायक हैं।
पूरे कॉलेज में , मैं अकेला मूढ़ ऐसा था जो ‘मूला’ को “मूलचंद जी” कहकर पुकारता था। यही कारण है कि मेरी फीस 4 बजे के बाद जमा हो पाती थी। मूलचंद जी अब रिटायर्ड हो गए हैं एक दिन मेरी ही गली से निकले तो मैंने दौड़कर उनके पैर छुए और संघर्ष के क्षणों में ‘बज्जिर-बेसरम’ रहने का आशीर्वाद माँगा।
नगर-निगम वाले मूल-चंद भी ‘मूल’ के प्रति अडिग हैं। चाहे प्रभारी-मंत्री बैठक ले। चाहे कलेक्टर मैडम निर्देश दें । चाहे विधायक जी मीटिंग में नर्राएँ, या लोग-बाग सड़कों पे चिल्लाएँ। चाहे पत्रकार लिखि-लिखि कागद कारे करें, चाहे माड़साब चिंता में सूखि मरें। चाहे हाथठेले वाले ढूँढत फिरैं, चाहे महापौर मशीन लेकर द्वार-द्वार कींचड़ निकालते रहें या सभापति आंधरे-बाबरे होकर सड़क खोद डारें । आयुक्त ‘मूलचंद हैं।
आईए हम भी मूल से जुड़ें। अगर हम मूल से जुड़े रहे तो एक दिन विश्वगुरु बनेंगे। – माड़साब

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