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आखिर कैसे होगी कांग्रेस की नेय्या पार

 

श्रीगोपाल गुप्ता

ग्वालियर-चम्बल संभाग में चार लोकसभा सीट मुरैना-श्योपुर , भिण्ड-दतिया ग्वालियर और गुना -शिवपुरी आती हैं। यदि गुना-शिवपुरी संसदीय क्षेत्र को छोड़ दें तो मुरैना-श्योपुर, भिण्ड-दतिया और ग्वालियर लोकसभा क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी के मजबूत किलों में तब्दील हो गये हैं, जबकि गुना-शिवपुरी कांग्रेस का कम सिंधिया परिवार का अभेद किला ज्यादा बनकर उभरा है। जिसका कारण है कि यहां से सिंधिया परिवार की प्रमुख व राजमाता सिंधिया ,माधव राव सिंधिया और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया जब भी किसी पार्टी या निर्दलीय के बैनर तले मैदान में उतरे किला फतह करके विजेता के रुप में ही सामने आये। अगर बात चंबल संभाग मुख्यालय मुरैना-श्योपुर संसदीय क्षेत्र की जाये तो 28 साल पूर्व कांग्रेस के अंतिम बादशाह जफरशाह घोषित हुये बारेलाल जाटव थे, जिन्होने महल (ग्वालियर सिंधिया राजवंश) की वफादारी और सरपरस्ती में आखरी मर्तवा सन् 1991 में भाजपा के स्वर्गीय छबिराम अर्गल को हराकर यह सीट कांग्रेस की झोली में डाली थी। उसके बाद सन् 1996 से पिछले आम चुनाव तक भाजपा ही अवरल विजय होती आई है। इसके बाद भिण्ड-दतिया पर तो अंतिम बार कांग्रेस इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सन् 1984 में देश भर में चली प्रचण्ड आंधी में महल की ही विरासत की महत्वपूर्ण सदस्य व अब राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को हराकर जीती थी। तब कांग्रेस की कृष्णा सिंह ने उस समय भाजपा की दिग्गज और वसंधरा राजे की मां राजमाता विजयराजे के जीवित रहते ही वसुंधरा राजे को चुनावी मैदान में पराजित कर दिया था। हालांकि कांग्रेस से खफा होकर स्यंम राजमाता सिंधिया जनसंघ के टिकट पर सन् 1971 में भिण्ड से चुनाव जीत चुकी थी और भिण्ड को वे अपनी परिवारिक सीट मानती थीं। मगर वे अपनी पुत्री को नहीं जितवा सकीं, लेकिन इसके बाद सन् 1989 में हुये लोकसभा चुनाव में भाजपा के नरसिम्हा राव दीक्षित ने यह सीट कांग्रेस से छुड़ाकर पुनः भाजपा के पाले में डाल दी थी। उसके बाद कांग्रेस पिछले चुनाव तक भाजपा से पार नही पा सकी। हां ये अवश्य है कि सन् 2009 में कांग्रेस में आये पूर्व आईएएस डा. भागीरथ प्रसाद ने भाजपा के अशोक अर्गल को कड़ी टक्कर तो दी, मगर वे अंतिम राउण्ड में मात्र 18897 वोटों से पिछड़ गये। कुल मिलाकर भिण्ड-दतिया संसदीय क्षेत्र आज भाजपा का मजबूत किला है।

हां इस मामले में संभाग की महत्वपूर्ण सीट ग्वालियर जरुर कांग्रेस के लिये अलग है। इसे भाजपा अपना गढ़ तो कहती है लेकिन पिछले एक उप चुनाव और दो आम चुनाव को छोड़ दें तो कांग्रेस के दिग्गज नेता व पूर्व केन्द्रीय मंत्री कैलासवासी माधवराव सिंधिया सन् 1984 जब उन्होने भाजपा के देश में एक नम्बर के नेता व पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई को हराया था, से लेकर सन् 1999 तक बिना किसी परेशानी व कड़ी मशक्कत के जीतते रहे,इस बीच एक मर्तबा सन् 1996 में कांग्रेस से अलग विकास कांग्रेस बनाकर चुनाव लड़ा और जीता भी था। 1999 में माधवराव सिंधिया गुना चले गए और वहां से चुनाव लड़ कर जीत गये, मगर इधर ग्वालियर से सिंधिया के जाते ही उनके हाथों हार का मुंह देख चुके बजरंग दल राष्ट्रीय सयोंजक जयभान सिंह पवाइया ने भाजपा के टिकट पर बाजी मार ली। लेकिन इसके अगले चुनाव में ही कांग्रेस के रामस्वरुप बाबूजी ने भाजपा से ये सीट वापिस कांग्रेस के खाते में जमा करा दी। लेकिन इसके बाद सन् 2007 में हुये उप चुनाव में स्थिति बदली और भाजपा की यशोदरा राजे सिंधिया ने जीत दर्ज कराते हुये कांग्रेस को झटका दे दिया। उसके बाद हुये 2009 के चुनाव में भी यशोदरा राजे ने अपनी पकड़ बनाये रखी फिर 2014 के आम चुनाव में मुरैना छोड़कर आये सांसद व तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने मोर्चा मार लिया। मगर लगातार इन तीन चुनाव में हारने वाले कांग्रेस के उम्मीदवार श्री अशोक सिंह मात्र 30 हजार से भी कम वोटों से हारे थे। ग्वालियर-चम्बल संभाग की इन तीनों सीटों पर कांग्रेस यदि हार दर हार की समिक्षा करे तो सामने आयेगा उसके स्थानीय नेताओं की अपने नेताओं की वफादारी। इन दोनों संभागों के कांग्रेसी नेता अभी तक तीन गुटों में बंटे रहे हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया इन तीनों के अनुयायी चम्बल की धरा पर बहुयात में पाये जाते हैं। चूकी सिंधिया जी का क्षेत्र है, तो अधिकांस जिला कमेटियों पर उनके वफादारों की लम्बी सूची है। परिणाम सामने रहे हैं कि ये वफादार बड़ी संख्या में अपने-अपने क्षेत्रों में कांग्रेस उम्मीदवारों को भगवान भरोसे छोड़ अपने नेता को जिताने के लिए उसके क्षेत्र में तैनात हो जाते हैं और उनकी जीत के श्रेय में भागीदार हो जाते हैं। इस दफा तो गजब है कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ-साथ दिग्विजय सिंह भी भोपाल से चुनाव लड़ रहे हैं, ऐसे में कांग्रेस में स्थानीय नेताओं का तो अकाल ही आ जायेगा और उम्मीदवार जनता और भगवान भरोसे ही रहेगा। अतः यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि आखिर कैसे होगी कांग्रेस की नेय्या पार?

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