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मुरैना-श्योपुर लोकसभा के लिये पोस्टर युद्ध चरम पर

 

श्रीगोपाल गुप्ता

मध्य प्रदेश ,चुनाव आयोग द्वारा अगामी लोकसभा चुनाव के लिए तारीख तय करने के साथ ही मुरैना-श्योपुर संसदीय क्षेत्र में अब भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में टिकट प्राप्त करने वाले दावेदारों के द्वारा गत दो महिने से चलाये गया दीवाल लेखन और पोस्टर युद्ध अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। वे नेता जो अपने-अपने दल से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये एक अदद टिकट पाने की चाहत रखते हैं, उनमें से अधिकांश नेताओं ने मुरैना-श्योपुर संसदीय क्षेत्र के मुरैना जिले के बुधारा से लेकर श्योपुर के कराहाल तख पोस्टर और दीवाल लेखन से पाट दिया है। हालांकि भाजपा के दावेदार कांग्रेस के दावेदारों से इस युद्ध में काफी कमजोर और पीछे रहे। जबकि 1996 के बाद हुये सभी लोकसभा चुनाव में भाजपा से मात खाने वाली कांग्रेस के दावेदार इस मामले में बाजी मार ले गये। इसका कारण है कि 15 वर्ष के लंबे अंतराल 2003 के बाद अब जाकर कांग्रेस की सरकार सूबे में काबिज हुई है,जिसमें मुरैना-श्योपुर संसदीय क्षेत्र का अहम योगदान है।मुरैना जिले की छह में से छह सीट और श्योपुर जिले की दो में से एक सीट कांग्रेस को मिली हैं जबकि गत 2013 में कांग्रेस को एक सीट पर ही संतोष करना पड़ा था। यही वह कारण है कि कांग्रेस के खेमे में भारी जोश है, इसलिये जो वर्षों से कांग्रेस से जुड़े होकर संघर्ष कर रहे वे भी और जो हाल ही में आये हैं, वे भी टिकट की दौड़ में जोर-शोर से अपने नेताओं के साथ-साथ पोस्टर और दीवाल लेखन युद्ध में जमीं -आसमां एक किये हुये हैं। इस युद्ध में जहां भाजपा के अम्बाह निवासी मनीष शर्मा अब्बल हैं, वहीं कांग्रेस से धुरंदर व जमीनी नेता कैलास मित्तल, विख्यात चिकित्सक डा. राकेश माहेश्वरी, दिमनी विधानसभा से दो मर्तबा मात्र कुछ ही हजार वोटों से पराजित हुये एंव प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री रविंद्र तोमर (भिड़ोसा) और प्रदेश की कभी मशहूर रही केएस आॅयल्स ग्रुप के चेयरमैन रमेश गर्ग मुख्य हैं।

इस पोस्टर युद्ध के बाहर और भी दावेदार हैं, जिनकी दावेदारी को भाजपा और कांग्रेस महत्व दे सकती हैं? भाजपा यहां से पूर्व की दो बार की तरह इस बार भी किसी ग्वालियर के नेता को उतार सकती है,तो कांग्रेस भी 2003 में केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के हाथों हार का स्वाद चख चुके प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत पर भी दांव लगा सकती है, चूकि वे हाल ही में विधानसभा चुनाव में विजयपुर से कांग्रेस लहर के बावजूद हार चुके हैं, इसलिये उनका नाम कट सकता है? अगर पोस्टर युद्ध के योद्धाओं पर गौर किया गया जैसा की कांग्रेस में चर्चा है तो पहला नाम कैलास मित्तल के नाम को आलाकमान की मंजूरी मिलने अत्याधिक संभावना है। इसका मुख्य कारण मित्तल की परवारिक पृष्ठभूमि, सन् 1978 से कांग्रेस में रहकर पार्टी के लिये काम करना और दिग्गज नेता व राष्ट्रीय महासचिव सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का विश्वास पात्र होना। मित्तल के बाबा स्वर्गीय गुलाब चंद व ताऊ स्वर्गीय काशीराम मित्तल दोनों का ही देश की आजादी में कांग्रेस के नेतृत्व में बेहतरीन योगदान रहा, दोनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं। इसके अलावा कैलास मित्तल नगर पंचायतों से लेकर जिला योजना समिति के कई निर्वाचित जनप्रतिनिधी रहे हैं। उनकी धर्मपत्नी भी जौरा नगर पालिका की अध्यक्ष रह चुकी हैं।मित्तल का दावा इसलिये भी मजबूत है क्योंकि वे वैश्य समाज के संभागीय संरक्षक है और अग्रवाल समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष होकर चंबल के प्रभारी हैं। डा. माहेश्वरी चम्बल अंचल के विख्यात चिकित्सक है और एक अच्छे समाजसेवी की पहचान भी उनके दावे को मजबूत बनाती है, इसके अलावा उनके पिता और संभाग के वरिष्ठ अभिभाषक हरस्वरुप माहेश्वरी एक समय में कांग्रेस के मजबूत स्तंभ थे। इसके अलावा रविंद्र सिंह तोमर प्रदेश कांग्रेस में महासचिव होने के साथ-साथ क्षेत्र में भी पकड़ रखते हैं। वे बुधारा से लेकर श्योपुर तक कई मर्तबा दौरा कर चुके हैं। अग्रवाल समाज के राष्ट्रीय नेता व उधौगपति रमेश गर्ग का नाम भी कांग्रेस में एक बड़ा नाम उभर कर सामने आया है,जिनको दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का करीबी होने का सौभाग्य प्राप्त है। बहरहाल ऐसा समझा जाता है कि कांग्रेस 15 मार्च तक प्रदेश की सभी 29 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर देगी।

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