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मेहनत से बच्चों को पढ़ा कर अफसर बनाना चाहती हैं-संध्या…


मेरे पति के जाने के बाद भले ही मेरे सपने टूट गए हैं पर हौसले अभी जिंदा हैं , मैं ईमानदारी से और संघर्ष करके अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर फौज में अफसर बनाना चाहती हूं, इसके लिए मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊंगी और न ही अपना स्वाभिमान को कम होने दूंगी। उक्त इन सब बातों का कहना है एक संघर्षशील, स्वाभिमानी महिला संध्या का। संध्या मध्य प्रदेश के कटनी रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करती हैं। वे यात्रियों का बोझ इसलिए उठाती हैं क्योंकि उन्हें अपना परिवार का बोझ उठाना होता है। वैसे भी देखा जाए तो महिलाओं की जिंदगी कम परिश्रम वाली नहीं होती, घर परिवार, कामकाज आदि को लेकर महिलाओं की एक अलग ही भूमिका होती है जिसको निभा पाना केवल महिलाओं को ही आता है।
संध्या भी उन्हीं महिलाओं में शामिल है जो अपने पति की मौत के बाद तीन बच्चे और बूढ़ी सास का पालन- पोषण स्टेशन पर यात्रियों का बोझ उठाकर कर रही हैं। संध्या के आत्मसम्मान और स्वाभिमान भरी बातों से लोग समझ ही जाते हैं कि संध्या किसी से मदद की याचना करने के बजाय वह संघर्ष और मेहनत करके अपने परिवार के लिए रोजी रोटी कमाने में विश्वास रखती हैं।
कुली नंबर 36 संध्या कटनी जंक्शन पर कुली का काम जनवरी 2017 से कर रही हैं। इनका पूरा नाम संध्या मरावी है। संध्या ने अपने नाम का रेलवे कुली का लाइसेंस भी बनवा लिया है। संध्या इस काम को पूरे परिश्रम और मेहनत के साथ करती हैं। रेलवे प्लेटफार्म पर जब संध्या यात्रियों का सामान उठाकर चलती हैं तो सभी लोग उन्हें देखकर आश्चर्य में पड़ जाते हैं और उनकी हिम्मत की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते।
संध्या देश में कुली का काम करने वाली गिनी चुनी महिलाओं में शामिल हैं जो 50 पुरुष कुलियों के साथ काम करके नारी शक्ति को बढ़ावा दे रही हैं। 32 वर्षीय संध्या अपने घर जबलपुर से कई किलोमीटर दूर कटनी जाती जाकर अपने कार्य को कई साल से अंजाम दे रही हैं।
पति की मृत्यु से पहले संध्या अन्य महिलाओं की तरह ही घर और बच्चों को संभाला करती थीं। उनके पति भोलाराम मजदूरी करके अपने घर का भरण-पोषण करते थे लेकिन बीमारी के चलते संध्या के पति का देहांत हो गया। पति की मौत के बाद घर परिवार की जिम्मेदारी संध्या के ऊपर आ गई। इसलिए संध्या को जल्द से जल्द काम की तलाश थी। जब कोई नौकरी नहीं मिली तो कुली की नौकरी के लिए आवेदन कर दिया। बाद में उनको यह नौकरी मिली और नंबर 36 का बिल्ला भी प्राप्त हुआ। संध्या जबलपुर के कुंडम क्षेत्र मैं रहती हैं। संध्या को रोजाना कुंडम से कटनी के लिए 90 किलोमीटर आना-जाना पड़ता था। कितने किलोमीटर दूर आने-जाने में उनका समय और धन की बर्बादी होती रही लेकिन बाद में उन्होंने रेल अधिकारियों को जबलपुर रेलवे स्टेशन पर काम करने की गुहार लगाई। बाद में अधिकारियों ने उनका तबादला जबलपुर स्टेशन पर कर दिया। संध्या जब जबलपुर आ गई तो उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई पर और ध्यान देना शुरू कर दिया। उन्होंने अपनी अतिरिक्त कमाई के लिए पार्ट टाइम जॉब की शुरुआत भी कर ली है। इतने संघर्षों के बाद आज संध्या आत्मनिर्भर हैं। पुरुषों के वर्चस्व वाले पेशे में कार्य करके उन्होंने यात्रियों का सामान उठाकर खुद को स्थापित किया। उनके काम को कुछ लोग छोटा समझ सकते हैं लेकिन उनकी शख्सियत बेमिसाल है।
सपना श्रीवास्तव

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